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मधुशाला (४)- डॉ. हरिवंश राय बच्चन

धर्म - ग्रंथ      सब    जला चुकी है
जिसके   अंतर    की         ज्वाला
मंदिर , मस्जिद , गिरजे - सबको
तोड़   चुका        जो      मतवाला ,
                        पंडित , मोमिन , पादरियों के
                       फंदों    को  जो   काट     चुका
कर सकती है आज उसी का
स्वागत मेरी      मधुशाला ।

लालायित  अधरों   से  जिसने
हाय ,  नहीं   चूमी        हाला ,
हर्ष - विकंपित कर से  जिसने ,
हा , न   छुआ  मधु  का प्याला
                   हाथ पकड़ लज्जित साकी का
                    पास   नहीं    जिसने    खींचा
व्यर्थ सुखा डाली जीवन की
उसने   मधुमय  मधुशाला ।

बने   पुजारी   प्रेमी   साकी ,
गंगाजल   पावन ,    हाला ,
रहे फेरता  अविरत  गति से
मधु के   प्यालों   की माला ,
                  और लिए जा , और पिये जा -
                   इसी   मंत्र      का   जाप करे ,
मैं शिव की प्रतिमा बन बैठूँ ,
मंदिर    हो  यह मधुशाला ।

बाजी न मंदिर में  घड़ियाली ,
चढ़ी न     प्रतिमा पर  माला
बैठा अपने भवन  मुअज्जिन
देकर   मस्जिद   में     ताला
                      लुटे  खजाने  नरपतियों के ,
                   गिरीं   गढ़ों    की     दीवारें ;
रहें    मुबारक पीने वाले
खुली रहे यह मधुशाला ।

बड़े - बड़े परिवार मिटें यों ,
एक    न   हो    रोने वाला
हो जाएँ सुनसान महल वे ,
जहां   थिरकती   सुरबाला
                 राज्य उलट जाएँ , भूपों की
                   भाग्य - सुलक्ष्मी सो जाये ;
जमे    रहेंगे   पीने वाले ,
जगा करेगी मधुशाला ।

सब मिट जाएँ  , बना रहेगा
सुंदर   साकी  ,   यम काला ,
सूखें  सब रस  ,  बने   रहेंगे
किन्तु , हलाहल , औ ' हाला ;
                  धूमधाम औ ' चहल - पहल  के
                    स्थान    सभी   सुनसान   बने ,
जगा करेगा अविरत मरघट ,
जगा     करेगी     मधुशाला ।

                                                               क्रमश:

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